अहा , ग्राम्य जीवन भी क्या है ...?re simple than village life...

Some true stories about village life

जोधपुर के आसपास ग्राम्य जीवन की झलकियाँ

रविवार, 23 अगस्त 2009

बिन पानी सब सून

राजस्थान का नाम लेते ही यह द्रश्य आँखों के आगे उभरता है ,कोंसो दूर से पानी के घडे सर पर रखे चेहरा आँचल में मुँह छिपाये कदमताल करती औरते पता नहीं यह प्रकृति का क्रूर मजाक है या सरकार का निकम्मापन की हम एक तरफ तो चाँद पर भारत का झंडा फहराने की तैयारी कर रहे हैं दूसरी तरफ़ मानव की मूलभूत आवश्यकता "शुद्ध पीने योग्य पानी "को सुलभ कराने की कोई ठोस योजना भी हमारे पास नहीं है बहुत से गाँव में तालाबों का पानी जानवरों के पीने योग्य भी नहीं है जिसे मज़बूरी में आदमी को पीना पड़ रहा है आज शहरों में हम मिनरल वाटर की बोतल के इतने आदि हैं की इस तरह के पानी पीने की मज़बूरी हमारी कल्पना से बाहर है तेज धूप,नंगे पाँव ,तपती बालू रेत ,घूँघट से ढका चेहरा ,सर पर पन्द्रह किलो का बोझ और मीलों का सफर -इस जिजीविषा को नमन है पर हमारी नैतिक जिम्मेदारी तो है

3 टिप्‍पणियां:

  1. हालात तो राजस्थान में बिशेष किन्तु देश के अन्य प्रदेशों में भी कमोवेश यही है।

    इस तरह पानी हुआ कम दुनिया में, इन्सान में
    दोपहर के बाद सूरज जिस तरह ढ़लता रहा

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  2. kaisi vidambna hai ki bharat teen taraf se paani se ghira hai par phir yahan log pyaas se marte hain, meri kavita par hausla afzai ke liye shukriya...

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