अहा , ग्राम्य जीवन भी क्या है ...?re simple than village life...

Some true stories about village life

जोधपुर के आसपास ग्राम्य जीवन की झलकियाँ

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

जोधपुर के आस पास वन्य जीव


जोधपुर के आसपास के छेत्रों में अनेक वन्य प्राणी स्वछंद विचरण करते हुए देखे जा सकते हैं.इनमे प्रमुख हैं हिरण,ब्लैक बक ,नील गाय,मोर,लोमडी ,खरगोश आदि.सुबह शाम हिरणों के झुंड के झुंड कुलाँचे भरते हुए नजर आयेंगे.इसी इलाके में सलमान खान शिकार प्रकरण हुआ है.यहाँ के लोग वन्य जीवों से छेड़ छाड़ पसंद नहीं करते हैं .बस दूर से निहारिए कैमरे में कैद कीजिये और आगे बढ़ जाइये किसी और दिलकश नज़ारे की तलाश में.मेरा व्यक्तिगत अनुभव है की अगर आप वास्तव में वन्य जीवों से प्रेम करते हैं तो आप को बहुत कुछ देखने को मिलेगा पर अगर आप वन्य जीवों के प्रति मन में हिंसा का भाव रखते हैं तो आपको निराश ही होना पड़ेगा.

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

बिन पानी सब सून


राजस्थान के अधिकांश हिस्सों में बारिश नहीं होने से इस बार अकाल का सामना करना पड़ेगा.इसे दोहरा अकाल भी कहते हैं क्योंकि किसान कर्ज लेकर बुवाई कर चुके हैं.पीने का   पानी सबसे बड़ी समस्या है ,तालाब सूखे पड़े हैं आदमी और मवेशी पानी कि तलाश में भटक रहे हैं (ऊपर का   चित्र आशु मित्तल द्वारा ).राज्य सरकार कि नींद उड़ चुकी है और पेयजल योजनाओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है.वैसे भी इस सरकार को सूखे का काफी अनुभव है.केंद्र भी दया के नाम पर मदद तो करेगा ही.कुल मिला कर अगर आप जी नहीं  सकते तो कम से कम आपको मरने भी नहीं दिया जायेगा.कोई बात नहीं हमारे मारवाड़ कि तो खासियत है पानी उन्डो है तो मिनक भी उन्डो है यानि चूँकि यहाँ पानी गहराई में मिलता है तो आदमी में भी सब्र का माद्दा ज्यादा है. 

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

मारवाड़ की मशहूर और नायाब जूतियाँ


राजस्थान का मारवाड़ प्रदेश जोधपुर जैसलमेर  पाली जालोर सिरोही बाड़मेर जिलों को मिला कर बना है.इस इलाके में ऊँठ बहुतायत से पाए जाते हैं इसलिए ऊँठ के  चमड़े से कुटीर उद्योग पनपे और आज जोधपुर कि बनी जूतियों कि एक अलग पहचान है .मुलायम चमड़े पर खूबसूरत कसीदा जूतियों कि शान में चार चाँद लगा देता है.अस्सी रूपये से लेकर दो सौ रूपये तक में आप एक खूबसूरत जोड़ा खरीद सकते हैं.काकेलाव गाँव के चौराहे  पर कोने में नीम के पेड़ के नीचे बैठा शंकरजी मोची कई पीढी  से यही काम कर रहा है.दाल रोटी मिल जाती है.लेकिन भौतिक वाद के इस युग में दाल रोटी से कौन खुश है.वो चाहता है कि उसके बच्चे पढ़ लिख कर कोई और काम धंधा  करें जिसकी समाज में इज्जत हो .

बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

सुरम्य व मनोरम धार्मिक स्थल - बूढा पुष्कर



अजमेर जयपुर  नेशनल हाईवे पर अजमेर से ५-६ किलोमीटर पहले घूघरा घाटी आती है यहीं से सीधे हाथ को एक सड़क पुष्कर जाती है . इस मार्ग पर पहले एक गाँव आता है होकरा और उसके बाद आता है बूढा पुष्कर .यह हिन्दुओं का एक धार्मिक स्थल है.जब ब्रह्मा जी को पृथ्वी पर यज्ञ करने की इच्छा हुई तो उन्होंने एक कमल पुष्प जमीन पर फेंका जो तीन स्थानों पर गिरा जो क्रमश: जयेष्ट ,मध्यम व कनिष्ठ पुष्कर कहलाये.इसमें से कनिष्ठ पुष्कर कालांतर में बूढा पुष्कर कहलाया.किम्वदंती है कि औरंगजेब जब अजमेर में दरगाह कि जियारत कर लौट रहा था उसने पुष्कर के मंदिर नष्ट करने का निश्चय किया.कनिष्ठ पुष्कर पर आकर जब उसने मुंह धोया तो वह एकदम वृद्ध दिखने लगा बाल सफ़ेद हो गए तब उसने पुष्कर पर आक्रमण का विचार त्याग दिया तभी से ये बूढा पुष्कर कहलाया.वसुंधरा राजे ने इस तालाब को गहरा करवाया व घाटों का जीर्णोधार करवाया.चारों तरफ नाग पहाड़ से घिरा यह एक सुरम्य व मनोरम धार्मिक स्थल है.

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

92 वर्षीय विधवा बग्तु देवी को मिली पेंशन


जोधपुर संभाग के सिरोही जिले में कालिंद्री के जरा आगे चारण बाहुल्य गाँव है पेशवा .यहाँ की ९२ वर्षीय विधवा बग्तु बाई पिछले ६५ वर्षों से अपने पेंशन के अधिकार के लिए लड़ रही थीं.इनके पति राजकीय सेवा में अध्यापक थे और १५ वर्ष तक निष्टा और लगन से बच्चों को पढाया.उसके बाद टी.बी.जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो अल्पायु में चल बसे.बग्तु बाई पर परिवार का बोझ आन गिरा परन्तु एक आस थी पति राज्य कर्मचारी थे पेंशन तो मिलेगी ही.स्कूल से लेकर जिला शिक्षा अधिकारी तक अनेक बार हाथ फेलाए ,उच्चतम अधिकारीयों तक भी चिट्ठी पत्री लिखी पर कुछ हासिल नहीं हुआ.मानवाधिकार आयोग में प्रार्थना पत्र दिया ,नोटिस प्रमुख शासन सचिव वित्त विभाग Shri C.K.Mathew (चित्र बाएं ) को मिला परन्तु एक संवेदनशील अधिकारी होने के नाते उन्होंने इसे गंभीरता से लिया.सभी सम्बंधित अधिकारीयों की जयपुर सचिवालय में मीटिंग रखी गयी. ज्ञात हुआ की बग्तु देवी के पति द्वारा प्रदत्त सेवाओं का अभिलेख नहीं है पुनः शिक्षा विभाग के अधिकारीयों को निर्देश दिए की रिकोर्ड की गहराई से छानबीन की जाय.

अंततः कुछ रिकॉर्ड मिला और कुछ Mathew साहब ने सहयोगी अधिकारीयों की सलाह पर अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए बग्तु देवी के पति के सेवा काल को पेंशन योग्य मानते हुए पारिवारिक पेंशन  दिए जाने का निर्णय लिया.सम्बंधित अधिकारीयों को स्वयं बग्तु देवी के गाँव जाकर पेंशन भुगतान के आदेश दिए.जिससे किसी बिचोलिये के हाथों राशी का दुरूपयोग न हो.जब करीब चार लाख की राशी का चेक बग्तु देवी के हाथों में दिया गया तो उनकी आँखों में ख़ुशी के आंसू थे.

रविवार, 27 सितंबर 2009

मथानिया की लाल मिर्च


मथानिया की लाल मिर्च अपने रंग और स्वाद के लिए इतनी मशहूर हुई की मेक्सिको के कृषि वैज्ञानिकों का एक दल मथानिया अनुसन्धान के लिए आया और मेक्सिको मैं इसकी  बड़े पैमाने पर खेती करने की सम्भावना पर शोध की.
बाजार मैं मिलने वाली हरी मिर्च को ही लाल होने तक पोधे पर पकने दिया जाता है.फिर इसे तोड़ कर सुखा लिया जाता है. मसाला पीसने की मशीन पर पीस लिया जाता है.इस लाल मिर्च के रंग व स्वाद का कोई मुकाबला नहीं है.आजकल मसालों में मिलावट की वजह से सब्जियों का स्वाद घटता जा रहा है वहीँ मथानिया की लाल मिर्च अपने मौलिक रूप में मौजूद है.बाजार में यह १२० रूपये प्रति किलो के भाव से बिकती है.मथानिया जोधपुर से ४० किलोमीटर दूर है . हम अपने परिवार एवं इष्ट मित्रों के लिए वहीँ से साल भर की जरुरत की मात्र खरीदते हैं.

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

अफीम वाला बाबा



जोधपुर से मात्र १७ किलो मीटर दूर जब आप नागौर रोड पर जा रहे होते हैं तो एक रेलवे फाटक आता है यहीं दाहिने हाथ पर डा.नारायण सिंह मानेकलाव द्वारा स्थापित अफीम नशा मुक्ति केंद्र है.मेरा परिवार जर्मनी से आई एक २१ वर्षीय अतिथि पर्यटक बन्ते को लेकर मानेकलाव पहुंचा.यह महिला प्रचलित पर्यटक स्थलों को देखने में रूचि नहीं रखती थी.मानेकलाव में उस समय २५ अफीम की लत से ग्रस्त अपना इलाज करवा रहे थे.लगभग सभी युवा थे.उन में से कुछ तो अन्य प्रदेशों से आये थे.हमने डाक्टरों व् मरीजों से काफी देर बात की.सभी इलाज से संतुष्ट थे.इलाज लगभग तीन माह चलता है इस दौरान रोगी को वहीँ रहना पड़ता है.बहुत मामूली खर्च में यह इलाज हो जाता है.केंद्र के नियम कानून जरूर कड़े हैं जिसके बिना इलाज संभव भी नहीं हैं. ऊपर वाले चित्र में मैं बन्ते के लिए दुभाषिये का काम कर रहा हूँ .बन्ते ने अनेक प्रश्न रोगियों से पूछे लत कैसे लगी ,पैसे कहाँ से आते थे ,अफीम कहाँ मिलती थी ,परिवार की जानकारी आदि आदि .एक समाज शास्त्री की तरह उसने पूरा विवेचन किया.सच पूंछो तो मुझे भी पहली बार इस व्यसन की इतनी विस्तृत जानकारी मिली.डा.नारायण सिंह पदम श्री व पदमविभूषण से सम्मानित हैं व राज्य सभा के सदस्य भी रह चुके हैं. लोग सम्मान से इन्हें अफीम वाला बाबा कहते हैं.